Thursday, April 28, 2011

समाजवादी आन्दोलन-संघर्ष और सत्ता

समाजवादी आन्दोलन-संघर्ष और सत्ता

अरविन्द विद्रोही
डा0 राम मनोहर लोहिया ने समाजवादी आन्दोलन को सार्थक व सही राह पर चलाने के लिए 1957 में ही कहा था - किसी भी बड़े आन्दोलन में एक अजीब तरह की वाहियात चीज या मोड़ बन जाया करता है। एक तरफ वे लोग जो कि आन्दोलन के उद्देश्यों के लिए तकलीफ उठाते हैं, दूसरी तरफ वे लोग जो आन्दोलन के सफल होने के बाद उसके हुकूमती काम-काज को चलाते हैं। और आप याद रखना कि ये संसार के इतिहास में हमेशा ही हुआ है लेकिन इतना बुरी तरह से नहीं हुआ कभी जितना कि हिन्दुस्तान में हुआ है। और मुझे खतरा लगता है कि कहीं सोशलिस्ट पार्टी की हुकूमत में भी एैसा न हो जाये कि लड़ने वालों का तो एक गिरोह बने और जब हुकूमत का काम चलाने का वक्त आये तब दूसरा गिरोह आ जाये।
डा0 राम मनोहर लोहिया की यह आशंका दुर्भाग्य-वश अक्षरशः सत्य साबित हुई।डा0 लोहिया के धुर अनुयायी मुलायम सिंह यादव भी बगैर संघर्ष किये हुकूमत चलाने वाले गिरोह के मोहपाश में जकड़ गये थे।तमाम खांटी समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव से दूर होते गये और मजे की बात यह है कि इन सबके दूर जाने के पीछे था सिर्फ एक चेहरा अमर सिंह। यह वह दौर था जब सपा में फिल्मी सितारों,खिलाड़ियों,पॅंूजीपतियों,ठेकेदारों, का वर्चस्व कायम हुआ। समाजवादी कार्यकर्ताओं के संघर्ष व त्याग के मूल्य की जगह ग्लैमर व दौलत ने ले लिया। कालान्तर में उ0प्र0 व केन्द्र दोनों जगह की सरकारों में सपा की कोई भागीदारी न रहने के कारण मौका पाकर व्यावसायिक नेता ने सपा व मुलायम सिंह यादव दोनों से किनारा कर लिया और अपना अलग राजनैतिक दल बना लिया।सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के लिए यह आघात के साथ-साथ एक सबक भी था।व्यावसायिक,आपराधिक प्रवृत्ति के दलबदलू लोग निहायत ही स्वार्थी व लोभी होते हैं।इन स्वार्थी लोगों का किसी भी राजनैतिक विचारधारा से कोई लगाव नहीं होता है। किसी भी संगठन से,उसके प्रचार-प्रसार से, विचारों के अनुपालन से इन तत्वों की कोई भी दिलचस्पी नहीं होती है। यह अवसरवादी प्रजाति के सर्वव्यापी जीव होते हैं तथा सरकार में रहकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। यह जनता का रूझान भांप कर उसी दल में प्रवेश करते हैं जिसकी सरकार बनने की उम्मीद होती है।
खतरा बहुत बड़ा है समाजवादी कार्यकर्ताओं के साथ-साथ समाजवादी पार्टी के नेतृत्व पर भी। एक तरफ दमनात्मक व अलोकतांत्रिक कार्यवाही पर आमादा उ0प्र0 की बसपा सरकार, दूसरी तरफ संघर्ष के पश्चात् सपा में संगठन में ही मौजूद गणेश परिक्रमा करने वाले,पूॅजीपतियों,स्वार्थी प्रवृत्ति के लोगों को नेतृत्व द्वारा तवज्जों दिये जाने का आंतरिक भय। और यह आंतरिक भय टिकट वितरण के बाद असंतोष के रूप में सामने आ रहा है।सड़क पर उतर कर गॉंव-गॉंव में जा कर जनता के दुःख-दर्द को बॉंटने वाला कार्यकर्ता या नेता कहॉं रोज मुख्यालय पर हाजिरी लगा पायेगा,इस तथ्य को समाजवादी पार्टी के नेतृत्व को संज्ञान में लेना चाहिए। एक बात और है समाजवादी पार्टी में कौन-कौन कार्यकर्ता व नेता अपने संगठन के कार्यक्रमों को मनोयोग से पूरा किया है,इसकी पुख्ता जानकारी नेतृत्व के पास होनी चाहिए।
डा0 लोहिया ने संगठन के संदर्भ में भी सचेत किया था कि संगठन में जो लोग आयें उनमें सहयोगिता होनी चाहिए। अगर संगठन चलाना है तो व्यक्तिवाद कैसे चल सकता है? दोनों में सहअस्तित्व नहीं हो सकता है।जब संगठन चलेगा तो व्यक्तिवाद को खत्म करना ही पडेगा। पूरी तरह से खत्म करना नामुमकिन है क्योंकि हम लोग पूरी तरह से तो अच्छे हो नही सकते। लेकिन जिस हद तक व्यक्तिवाद को खत्म करना जरूरी है,करना पड़ेगा।

Tuesday, November 9, 2010

सपना


सपना देखा,लगा जिन्दगी हो ........

भरी गर्मी में,भरी दोपहरी महसूस हुआ....

सपना नहीं,मेरी जिन्दगी का सच हो।

आँखे खुली -अधखुली अपलकनिहारती.....

क्या कहें,क्या कुछ ना कहें......

देखो वर्षों बीत गए.......

सोचते हुए ,कब कहें ,कैसे कहें.................

तुम सपना हो मेरी जिन्दगी का.........

और जिन्दगी अमानत है,

माँ-बाप,खानदान की.

कुल-नाम-मर्यादा का ख्याल......

हर पल तेरी याद,तेरा ही ख्याल,

कौंधता एक सवाल....

आँखे देखती रहीं,

मन चुप ही रहा.....

रिश्ता कैसा बन गया है

तुमसे मेरा....

ना कुछ और कहा,

ना सुना ,

इस प्यार में.......

तुमने भी और तुम्हारे दिलोदिमाग ने।

आज फिर तुमने मजबूर किया......

तुम्हे समझाने को निगाहों से नहीं........

वाणी से,शब्दों से,

स्फुटित स्वरों से .......

कि मेरी सपना अब तू हकीकत है,

किसी जिन्दगी की......

अब इस नए रिश्ते की मर्यादा में तुम्हे......

निकलना होगा अपने जेहन से मुझे व मेरी शरारतें...।

जिन्दगी की धरातल पे सपनो की इमारत....

रेत के महल की तरह,

लहरों के झोंके से........

भरभरा कर गिर गयी। लेकिन खामोश

हूँ सिर्फ इसलिए ....

मेरी सपना रहे मेरी.सिर्फ मेरे लिए....

इसलिए इंतज़ार है............

काली रात का अब इस बियावान में.

Thursday, October 21, 2010

अपने मन के रावण को मारें,मन का अंधेरा मिटायें-दीप पर्व मनायें

फिर इस वर्ष भी हमने,हम सबने लंकेश रावण के पुतले का दहन कर डाला।नव दुर्गा का उपवास रखा,शक्ति रूपों की पूजा की,माँ-स्वरूप् कन्याओं को भरपूर भोजन कराया,उन्हें भेटें दी।अब हम सभी को दीपावली की तैयारी में लगना है।सुख,समृद्धि,खुशियों के त्यौहार,मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्री रामचन्द्र जी के लंका विजय व वनवास पूरा करने के पश्चात् अयोध्या वापस आने की प्रसन्नता में मनाया जाने वाला दीप पर्व भी हमें मनाना है।अंधकार भगाने के प्रतीक स्वरूप दीपावली का यह पुनीत पर्व सम्पूर्ण परिवार तथा समाज को बहुप्रतीक्षित सदैव रहा है।साथ ही साथ धनतेरस,नरक चैदस,गोवर्धन पूजा,भैया दूज,कलम दवात आदि पर्व हम श्रद्धा-भक्ति व धूमधाम से मनायेंगें।सदियों से इन त्यौहारों को मनाने की परम्परा है और निःसन्देह सदैव रहेगी।

प्रत्येक त्यौहार-परम्परा का एक विशेष महत्व होता है।उसके मूल में एक सन्देश-भाव छिपा रहता है।महापराक्रमी विद्वान दशानन लंकेश रावण पर अयोध्या के राजकुमार-वनवासी राम की विजय सिर्फ एक व्यक्ति की दूसरे व्यक्ति पर विजय नहीं थी।न ही यह विजय राक्षसों की सेना पर वानरों,भील आदि रामभक्तों की सेना की विजय मात्र थी।वस्तुतःयह विजय थी-सत्ता के मद में चूर महापराक्रमी रावण के द्वारा स्त्री के अपमान के फलस्वरूप् उत्पन्न परिस्थितियों एवं असत्य के राही एवं मदमस्त रावण पर मर्यादा की स्थापना हेतु पिता के आज्ञा पालन हेतु अयोध्या छोड़कर वन में विचरण करने वाले सत्य के राही राम की।यह विजय थी-असत्य पर सत्य की।

सत्यमेव जयते।सत्य की विजय हो।कैसे?कभी सोचा हमने? आज तो जन-मन-गण की सोच ही थक चुकी है या साफ-साफ कहें तो सोच निस्प्राण होकर विकृत अवस्था को प्राप्त हो चुकी है। जहाँ जिस धरा पर आदिकाल से वसुधैव-कुटुम्बकम् की अवधारणा स्थापित रही हो, वहां पाश्चात्य सभ्यता व पूंजीवाद इतना प्रभावी हो गया है कि पैसों के लिए परिवार भी विखण्डित हो रहे हैं।पारिवारिक विखण्डन अब व्यक्ति के आंतरिक टूटन की वजह बन गई है।अंधाधुंध आर्थिक उन्नति की मंजिलें तय करते-करते मनुष्य मानसिक-सामाजिक-चारित्रिक रूप से बिखरता जा रहा है।इन नैतिक मूल्यों का हनन व्यक्ति-परिवार-समाज सभी को हानि के अतिरिक्त कुछ भी नहीं दे रहा है।

हाँ, तो बात फिर से दीपावली पर्व के सन्दर्भ में।दीप पर्व की हमारे वर्तमान जीवन में उपयोगिता की,असत्य पर विजय प्राप्त कर के अयोध्या वापस लौटे मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम चन्द्र जी के सम्मान व स्वागत में आयोजित हुए इस दीप पर्व के आज हमारे द्वारा परम्परागत रूप से मनाये जाने की प्रासंगिकता पर।माँ कैकेयी द्वारा मांगे गये पिता से वरदान की लाज रखने हेतु,पिता के वचनों की,राजधर्म की मर्यादा की रक्षा के लिए पत्नी-भाई समेत वन जाने जैसा आचरण क्या आज हमारे समाज में करने की कोई सोच भी सकता है?आज तो हालात यह हो गई है कि पुत्र के विवाहोपरान्त बेचारे माॅं-बाप ही घर से कब निकाल दिये जायें,इसका ही ठिकाना नहीं है।रिश्तों को भौतिकता रूपी दीमक चाट चुका है।लालच का बिच्छू अपना जहर लोगों के नसों में उतार चुका है।मिथ्याचरण मनुष्य के आभूषण रूप में सुशोभित हो रहा है।सदाचार मानव स्वभाव से विलुप्त हो चुका है और व्यभिचार आम जीवन शैली का अनिवार्य हिस्सा बना हुआ है।आज कहाँ हैं राम जैसा आज्ञाकारी पुत्र कहाँ है भरत-शत्रुध्न और लक्ष्मन जैसे भाई?क्या कोई स्त्री सीता जैसा कष्ट सहने का,पति के साथ दुःखमय जीवन जीने का निर्णय ले सकती है?त्याग की भावना की जगह वासना-पूर्ति की अभिलाषा अपना साम्राज्य स्थापित कर चुका है।तो क्या हमें अपने अन्दर के राक्षस रूपी इन विकारों को,आसुरी प्रवृत्तियों को खत्म करने का प्रयास नहीं करना चाहिए?क्या परम्परागत रूप से महाविद्वान पुलस्त्य ऋषि के नाती,महापराक्रमी,बलवान,ज्ञानी,शिवभक्त परन्तु अहंकारी,सत्ता मद में चूर,राक्षसी प्रवृत्ति के,स्त्री उत्पीड़क लंकेश रावण के पुतले का दहन कर के ही हम दशहरा मनाते रहेंगें?सिर्फ परम्परा के निर्वाहन हेतु दीप पर्व मनायेंगें?

आइये……समाज के हितार्थ स्वयं की आन्तरिक आसुरी शक्तियों के खिलाफ धर्मयुद्ध की शुरूआत करें।अन्र्तद्वन्द छेड़े।चेतना को नया आयाम दें।नया सबेरा लाने की दिशा में कदम बढ़ायें।अपने मन के लंकेश को सदाचार रूपी बाणों से नाभि प्रहार यानि दुराचरण का खात्मा करके आसुरी शक्ति को परास्त कर परिवार-समाज की उन्नति का मार्ग प्रशस्त करें।यदि मानव एैसा करे तो श्री रामचन्द्र जी के लंका विजय के उल्लास में,अयोध्या वापसी की प्रसन्नता में आज तक मनाये जा रहे इन पर्वों की,दीप पर्व की प्रासंगिकता हमारे वर्तमान में है अन्यथा सिर्फ अवकाश,थोड़ा सैर-सपाटा,मन बहलाव व ईश्वर भक्ति के ढ़ोंग के लिए दीपावली मनाना कोई मायने नहीं रखता।

श्रमिक वर्ग की दशा और सुधार के उपाय

अरविन्द विद्रोही

मेहनत मजदूरी करने वालों की स्थिति में सुधार अभी तक क्यों नहीं हो पाया, यह सवाल अभी भी सरकारों की चिन्ता में शामिल नहीं है। शारीरिक श्रम करने वालों चाहे वो छोटी जोत के किसान हों, दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूर हों, विभिन्न कल-कारखानों में कार्य करने वाले मजदूर हों, विभिन्न सरकारी व गैर सरकारी कार्यालयों में कार्य करने वाले पत्रवाहक, चैकीदार, खलासी, वाहन चालक आदि चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हों, सारे का सारा श्रमिक वर्ग अपने परिवार के समुचित पालन पोषण में ही अपनी जिंदगी को व्यतीत कर देता है। भरपूर मेहनत के बावजूद अपने परिवार की जरूरतों को पूरा न कर पाने के कारण एक अजीब सी निराशा व घुटन में मेहनतकश तबका जी रहा है। वहीं दूसरी तरफ समाज में नेताओं, नौकरशाहों,अपराधियों, व्यापारियों, कालाबाजारियों आदि के पास अकूत सम्पत्ति एकत्र होना बदस्तूर जारी है। एक ही देश-समाज के नागरिकों के बीच पूंजी का आमदनी का घनघोर असंतुलन बड़ा ही कष्टकारी है।

समाजवादी चिंतक डा0 राम मनोहर लोहिया अगस्त 1963-64 में इलाहाबाद गये थे। धर्मवीर गोस्वामी, लक्ष्मीकान्त वर्मा, रजनीकान्त वर्मा तथा कुछ अन्य कार्यकर्ताओं के साथ डा0 लोहिया सोरांव के गांव में गाडी से गये। डा0 लोहिया ने दलित बस्ती का रास्ता पूछा और वहा पहुच गये। दलित बस्ती में पहुचते-पहुचते काफी भीड़ जमा हो गई। डा0 लोहिया ने हरिजनों के घर में जाकर औरतों से कहा कि हम तुम्हारी अनाज की हांड़ी देखना चाहते हैं। भौचक रह गई औरतों ने कुछ सोचने के बाद घर के भीतर अनाज की हांड़ी तक सभी को जाने दिया। पचासों झोपड़ियों की हाड़ियों में डा0 लोहिया ने हाथ डाल कर देखा। मात्र दो घरों की अनाज की हनडी में बमुश्किल आधा किलो आटा था। इन घरों के लोग कमाने निकले थे, कमा कर जब आयेंगें, तभी आटा आयेगा और परिवार के सदस्यों को खाना मिलेगा, यह वस्तुस्थिति थी। विचित्र प्रकार की पीड़ा से उद्विग्न हो चुके डा0 लोहिया के माथे पर शिकन आने के साथ-साथ चेहरा तनावग्रस्त हो गया। डा0 लोहिया चुप न रह सके, उन्होने कहा कि-दामों की लूट ने इनको रसातल में भेज दिया है। सामाजिक तौर पर जाति टूट भी जाये, आर्थिक स्तर पर ये जहा हैं वहा से भी नीचे जाति के घेरे में फंसे रहेंगें ।

डा0 लोहिया न्यूनतम आमदनी को बुनियादी सवाल मानते थे। डा0लोहिया का मानना था कि न्यूनतम आमदनी के हिसाब से अधिकतम आमदनी को तय करना चाहिए। उन्होंने उदाहरण स्वरूप् कहा था कि-तीन आना तय करता है कि कुल आमदनी पन्द्रह रूपये से ज्यादा न जाये।डा० लोहिया नकल करने की प्रवृत्ति को अभिशाप मानते थे। यूरोप व अमेरिका की नकल करते हुए भारतीयों द्वारा फैशन व विलाशिता में उस समय करीब १५ अरब रूपये खर्च करने की बात डा0लोहिया ने उस समय कही थी।आज तो फैशन व विलासिता का जहर भारतीय ग्राम्यांचलों में भी तेजी से घुलता जा रहा है। डा0लोहिया का मानना था कि मनुष्य की एक घण्टे की मेहनत का फल वह चाहे जहां हो प्रायःबराबर हो। दोगुने से ज्यादा यह अन्तर न हो यह स्पष्ट किया था डा0लोहिया ने। डा0लोहिया का मानना था कि-हमें कम से कम यह सिद्धान्त अपना लेना है कि मनुष्य की मेहनत का फल दुनिया में प्रायः समान होना चाहिए यानि पैदावार के हिसाब से। एक घण्टे में मेहनत करके जितनी दौलत पैदा करता है कोई आदमी, दुनिया के किसी कोने में, उतनी ही या प्रायः उतनी हर कोने में होनी चाहिए।

आजाद भारत में भारत के संविधान के दायरे रहकर विभिन्न मजदूर संगठन मजदूरों के अधिकारों के लिए आवाज उठाते हैं। ज्यादातर मजदूर संगठन राजनैतिक दलों और प्रबन्ध तंत्र पर निर्भर हो गये हैं तथा मजदूरों से, उनकी असल दिक्कतों को दूर करने के प्रयासों से दूर होते चले गये हैं। तमाम मजदूर संगठन होने के बावजूद संगठित क्षेत्र के मजदूरों का मात्र दस फीस दी हिस्सा ही मजदूर संगठनों से जुड़ा है। असंगठित क्षेत्र के करोड़ों मजदूरों के हितों के लिए सिर्फ छोटे स्तर पर कुछ ही स्वयं सेवी संस्थायें कार्यरत हैं। भारत में श्रमिकों के अधिकारों का पालन नहीं किया जा रहा है। समाजवाद के दबाव में श्रमिकों को जो विधिक अधिकार प्राप्त हैं, उनकी परवाह मिल मालिक और प्रबन्ध तंत्र तनिक भी नहीं करता। विकास का हर पत्थर मजदूरों के खून पसीने से सना होने के बावजूद मजदूरों का स्वयं का जीवन विकास से कोसो दूर हैं। मजदूरों की जिन्दगी दयनीय, अभाव-ग्रस्त तथा दर्द में लिपटी हुई है। मजदूरों की इसी पीड़ा को महसूस करते 8अप्रैल,1929 को कोर्ट में दिये अपने बयान में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने कहा था कि अंत में वह कानून अर्थात औद्योगिक विवाद विद्येयक, जिसे हम बर्बर और अमानवीय समझते हैं, देश के प्रतिनिधियों के सरों पर पटक दिया गया और इस प्रकार करोड़ों संघर्षरत् भूखे मजदूरों को प्राथमिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया गया और उनकी आर्थिक मुक्ति का एकमात्र हथियार भी छीन लिया गया। जिस किसी ने भी कमर तोड परिश्रम करने वाले मूक मेहनतकशों की हालत पर हमारी तरह सोचा है, वह शायद स्थिर मन से यह सब नहीं देख सकेगा। बलि के बकरों की भंाति शोषकों -और सबसे बड़ी शोषक स्वयं सरकार है-की बलिवेदी पर आये दिन होने वाली मजदूरों की इन मूक कुर्बानियों को देखकर जिस किसी का दिल रोता है वह अपनी आत्मा की चीत्कार की उपेक्षा नहीं कर सकता। मानवता के प्रति हार्दिक सद्भाव तथा अमिट प्रेम रखने के कारण उसे व्यथ्र के रक्तपात से बचाने के लिए हमने चेतावनी देने के इस उपाय का सहारा लिया है और उस आने वाले रक्तपात को हम ही नहीं, लाखो आदमी पहले से देख रहें हैं। क्रांति को स्पष्ट करते हुए अपने बयान में इन्होंने कहा कि क्रान्ति से हमारा अभिप्राय है-अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज-व्यवस्था में आमूल परिवर्तन। समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मजदूरों को उनके प्राथमिक अधिकार से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूंजीपति हड़प् जाते हैं। दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मुहताज हैं। दुनिया भर के बाजारों को कपड़ा मुहैया करने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढ़कने भर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है। सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार तथा बढ़ई स्वयं गन्दे बाड़ों में रहकर ही अपनी जीवन लीला समाप्त कर जाते हैं। इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूंजीपति जरा-जरा सी बातों के लिए लाखों का वारा-न्यारा कर देते हैं। यह एक भयानक असमानता और जबरदस्ती लादा गया भेदभाव दुनिया को एक बहुत बड़ी उथल-पुथल की ओर लिए जा रहा है। यह स्थिति अधिक दिनों तक कायम नहीं रह सकती। स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुख पर बैठकर रंगरेलियां मना रहा है और शोषकों के मासूम बच्चे तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल रहे हैं।

क्रांतिकारियों के बौद्धिक नेता सरदार भगतसिंह और समाजवादी चिंतक डा0 राम मनोहर लोहिया मेहनत कशों की उपेक्षा को समाज के लिए भयावह मानते थे। इन मेहनतकशों के जीवन स्तर को बगैर अच्छा करे देश की तरक्की के दावे व बातें सिर्फ पूंजीवाद का भौंड़ा व घिनौना प्रलाप है।भारत की वास्तविक शक्ति किसान और मजदूर हैं, इनकी समृद्धि के बगैर देश में खुशहाली आ ही नहीं सकती। इसकी ईमानदार कोशिशें सरकारों को करनी चाहिए क्योंकि -जब तक भूखा इन्सान रहेगा धरती पर तूफान रहेगा।

Friday, October 15, 2010

बिहार के नेताओं की दबंगई : चुनाव से पहले चुनाव के बाद

बिहार , लोग कहते है ज्ञान की उत्पत्ति  यहीं  से हुई थी , इतिहास गवाह है गणित का जन्म यही हुआ था , कहने वाले तो ये भी कहते है बिहार नही रहता तो शायद विज्ञान आज स्थिति मे नही रहता । राजनैतिक सिद्धांतों  का गढ , सामाजिक आन्दोलन की शुरुआत  करने वाली यह पावन भूमि  कभी मगध के नाम से भी जानी जाती थी ।

और आज का परिदृश्य , हमे मनोज तिवारी का गाया हुआ एक गीत की याद दिलाता है

सारा जग जीत हम गईनी , घरवे मे हारि हो गईल ।

जी आज के राजनैतिक उठा पटक को देखने के बाद इस गीत का महत्व बढ जाता है । बिहार वो धरती जिसने भारत के प्रथम राष्ट्रपति को जन्म दिया , बिहार वो धरती जिसने लोकनायक जय प्रकाश को जन्म दिया । बिहार वो धरती जिसने महात्मा गाँधी को जमीन दी अपने कदम टिकाने के लिये , जिसने जनता दिया उनकी ताकत बनने के लिये और वो बिहार आज के चँद नेतावो के वजह से अपने अस्तित्व को तलाश रहा है ।

टिकट की गहमागहमी और फिर पिंड दान , अर्थी पे अपने नेतावो के पुतले ले जाना , अपने पार्टी के मुख्यालयो पे हमला करना , अपने नेतावो के घर पे हमला करना तो जैसे आम बात हो गई है । इन सब को देख कर एक नेता ने सही ही कहा है कि बिहार मे अगर विधानसभा की सीटो की संख्या 1000 भी कर दी जाय तो शायद यही मारामारी रहेगी ।

लेकिन इन सब मे एक प्रश्न उठता है कि आखिर क्यो ? ऐसा क्यो कर रहे ये नेता ? क्या इनका एक उद्देश्य केवल विधायक बनना है ? या फिर ये जनता की सेवा के लिये लालायित हो रहे है ?

शर्म तो तब आती है कि कुछ और लोग भी इनके साथ इन कार्यो मे जुट जाते है ।
 
बात यह आती है कि जो आज अपने टिकट के लिये इतनी मारामारी कर रहे है क्या वो बिहार के विकास के लिये , अपने क्षेत्र ( जहा से लडने के लिये टिकट मांग रहे है ) के विकास के लिये , बिहार की जनता के सुख और सम्मान के लिये ऐसे ही विरोध जता पायेंगे ?

नही कभी नही क्योकि इतिहास गवाह है ऐसे नेता केवल और केवल पोस्ट के लिये सत्ता के लिये सबकुछ करने को तैयार हो जाते है लेकिन जब बात जनता की सेवा के लिये आती है तब ये लोग कही एसी केबिन मे बैठ के मजे मे मजे का मजा लुटते है ।


आज जरुरत है जनता को ऐसे नेतावो के बहिषकार करने की , ऐसे नेतावो को इनकी जगह देखाने की , और अगर आज इनकी दबंगई पे जनता ने आवाज नही उठाया तो फिर कल बहुत देर हो जायेगी ....
लेखक- नवीन कुमार
 

Thursday, October 14, 2010

RSS , Janasangh & BJP at a glance

Bhartiya Janta Party
Every time , in order to provide a proper platform to their Self Created issues they choose some specific leaders, some specific place and some specific time.
We all knows that Rath Yatra started by our PM - IN -WAITING Mr. L K Advani and same yatra leads the several riots in entire nation. One of the horrible repercussions of the Hindu- Muslim divide were the Post- Godhra riots in Gujarat in 2002. They were a pre- planned genocide.
Later development- After several yatras Mr. Advani nominated for PM post from NDA side.
Gujarat riots are successfully executed by in leadership Mr. Narendra Modi and his team. Thanks to our judiciary system that one Minister bail was rejected by court and we hope that court will reach to all who played a vital role in both Pre and Post Godhra riots.
Now, if we look back in history (almost 10 years ago) , The BJP won near about 60 seats from UP on the name of Lord Ram and Mandir-Masjid issue . Now the same figure has fall down drastically in last two Loksabha elections, and it was worried sign for BJP.
So, BJP decided to bring back same Mandir , Masjid saga in 2009 Loksabha election and for that they choose one Young person who is well educated in London and belongs to Nehru - Gandhi family known as Mr. Varun Gandhi.
When Varun Gandhi gave the Speech of Hatred in Pilibhit (his constituency),at that time the BJP Vice President Mr. Mukhtar Abbas Nakvi and Mr. Shahnawaz Hussain (Former Minister of BJP)said that BJP having no relation with Varun speech and BJP is disassociating itself from that hate speech. Later update in Varun saga is known to all.
Well ,to realize the views of BJP we need to look back in the history of RSS, BJS and BJP.

Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS)
Founded in 1925, the RSS was organised on authoritarian and militaristic lines and, functioning below the surface and glorifying violence, it was developed basically as an anti-Muslim organisation. It did not participate in the anti-imperialist movement or wage any anti-imperialist struggle even of its own conception on the ground that it had to conserve its strength for its main task of protecting Hindus from Muslim domination. It grew in northern India in the 1940s because of communalisation of politics during the War years and large-scale communal violence, in which it played an active role during 1946-1947.
Though not directly involved in the assassination, it had been waging a campaign of hatred against Gandhiji and other Congress leaders publicly and in its shakhas or branches, it often branded Gandhiji and other national leaders anti-Hindu and ``traitors.'' Referring to them, M. S. Golwalkar, supreme head of the RSS nominated as such for life, wrote in 1939: ``Strange, very strange, that traitors should be enthroned as national heroes.'' In 1947, he accused Gandhiji of asking ``all Hindus to become Muslims.'' Pouring venom, he said the Congress leaders were asking the ``Hindu'' to ignore, even submit meekly, to the vandalism and atrocities of the Muslims. In effect, he was told: ``Forget all that the Muslims have done in the past and all that they are now doing to you... if they carry away your wives and daughters, let them. Do not obstruct them. That would be violence.'' The reference to violence in the end makes it clear that Golwalkar's finger was pointing at Gandhiji. It was this vicious communal campaign of hatred which created an anti-Gandhi hysteria and the atmosphere for his assassination. It is immaterial which group the assassin belonged to.
Keen on persuading the government to lift the ban on the RSS, its leaders gave an undertaking in 1949 that it would not take part in politics. But, in fact, they were quite keen on playing an active role. And since the RSS could not directly enter politics under its own banner, it decided to do so through a party of its own, Jan Sangh, which it could run and control firmly from behind the scenes, through its cadre and organisation men.
Janasangh
A communal party is one which is structured around a communal ideology. The communal ideology is central to it, it is the very reason for the party's existence. Without the communal ideology, the party disintegrates. Also, a communal party cannot be defined by specific policies, for it can discard any of its programmatic and policy elements and sometimes adopt the very opposite ones. Its economic, political and social policies are generally a husk or mask which can be changed at appropriate moments to suit its electoral or other political needs, which it perceives as essential for capturing political power which, in turn, is needed for implementing its communal agenda. A communal party is not a conservative party for it is not committed to the conservation of large elements of the existing social, economic and political structure. It is, however, a right-wing party for it cannot communalise the state and society without strengthening the reactionary, exploitative elements of the economy.
The Jan Sangh was launched as a political party in October 1951 with Dr. Shyama Prasad Mookerjee as its president. After his resignation from Jawaharlal Nehru's Cabinet in April 1950, Mookerjee was looking for a party and the RSS was looking for a leader - the two came together. Ostensibly, the Jan Sangh was a party in its own right and under Mookerjee it did enjoy a certain degree of independence, but even then its spearhead was the RSS and its carefully- chosen cadre who were put in crucial positions in the new party. After Mookerjee's death in 1953, the fig-leaf of its being an independent party was gradually given up. Since 1954, when its second president, Mauli Chandra Sharma, resigned in protest against the RSS domination of the party, the Jan Sangh and its later-day reincarnation, Bharatiya Janata Party (BJP), have been more openly associated with and controlled by the RSS, which has provided them with the bulk of their leaders at the top as well as lower levels.

Founder
The BJP is the successor party of the BJS, which merged itself into the Janata Party in 1977. The BJP was formed as a separate party in 1980 after internal differences in the Janata Party resulted in the collapse of it's government in 1979.
Formation of Bhartiya Janta party and Founder ( from jansangh)
Shyama Prasad Mookerjee became the opposition leader when Krishak Praja Party - Muslim League coalition was in power 1937-41 and joined the Progressive Coalition Ministry headed by Fazlul Haq as a Finance Minister and within less than an year resigned. He emerged as a spokesman for Hindus and shortly joined Hindu Mahasabha and in 1944, he became the President.
After the assassination of Gandhiji, he wanted the Hindu Mahasabha not to be restricted to Hindus alone or work as apolitical body for the service of masses and broke away from it on this issue on November 23, 1948. Pandit Nehru inducted him in the Interim Central Government as a Minister for Industry and supply. On issue of Delhi pact with Likayat Ali Khan, Mookerjee resigned from the Cabinet on 6th April 1950.
After consultation with Shri Golwalkar Guruji of RSS Shri Mookerjee founded Bharatiya Jana Sangh on 21st Oct. 1951 at Delhi and he became the first President of it.
BJP with Lal Krishna Advani
Advani’s sectarian views were of long origin — they dated to his schooldays in Karachi, before Independence and Partition. But this muscular brand of mass politics was a recent preference. For much of his career, Advani had been an organization man, who worked in the party office, preparing briefs and training cadres. It was only in 1989 — less than a year before his yatra — that he had fought and won his first Lok Sabha election.

In Moradabad, Advani said it was “his wish that a temple was constructed in Ayodhya”. According to one news report, he then “claimed this was also the wish of majority of the citizens”. In Shillong, Advani said of the attacks on Christians in Orissa and Karnataka that “I strongly condemn these acts of violence and vandalism which cannot be condoned or justified”. Then he added: “Let the people belonging to all religious communities consciously strengthen the bonds of Indianness that tie us together in the larger interest of national community”.

These statements are considerably at variance with one another. But each made ‘sense’ in its particular context. In UP, where the BJP once enjoyed power and hopes to do so again, Advani appealed to the baser, more extreme elements in the Hindutva community. Speaking at a rally of party workers, he urged them to once more raise a deeply divisive issue. In so doing, he made a spurious claim, a claim perhaps necessary to spur the cadres, but a bogus one all the same. Even in UP, where Ayodhya is located, the BJP has never managed to gain more than 40 per cent of the vote. In other states, their standing among the electorate is even lower.

Shillong radically differs from Moradabad in its religious composition, as well as in its political profile. The BJP has no presence in this state, but still, Advani needs to persuade the Christians of the North-east that he is a ‘responsible’ man, who can be trusted by them as prime minister.

On September 25, 1990, L.K. Advani left the temple town of Somnath, in Gujarat, on a 6,000-mile journey through eight states that he intended to complete, five weeks later, at Ayodhya. Along the way, Advani made many speeches aimed at tearing asunder the bonds of Indianness and promoting discord among different groups. At each stop, he was welcomed and sent off by activists of the Vishwa Hindu Parishad and the Bajrang Dal, brandishing swords and trishuls.

A party who changes its color with the time , position and situation to capitalize some votes , to get some post is waiting to divide Our beloved nation.

Source: Several news paper s, Article of ramchandra guha , India Together etc

written by: Navin kumar